प्रेरणा

एक बच्चा था। वह बेहद गुड़ खाता था। बच्चे के माता-पिता उस की  इस आदत से बेहद परेशान थे। उन की समझाइश अथवा डाँट-डपट का बच्चे पर कोई प्रभाव न पड़ता था। हार कर वे बच्चे को ले कर एक पहुंचे हुए महात्मा की शरण में गए और महात्मा को बच्चे की इस बुरी आदत के बारे में बता कर विनयपूर्वक बोले, “महात्मन! कृपया बच्चे को समझाएँ ताकि वह इस बुरी आदत को छोड़ दे। हमारी समझाइश का तो उस पर कोई असर पड़ता नहीं है। शायद आप का कहना वह मान ले।”

महात्मा ने मुस्कुराते हुए, बेहद स्नेहपूर्वक उस बच्चे को ज्यादा गुड़ खाने से होने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी दी और उसे यह आदत छोड़ देने के लिए कहा।

महात्मा के तेजस्वी चेहरे एवं ओजपूर्ण वाणी का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ा। उस ने, वहीँ, सब के सामने, अत्यधिक मात्रा में गुड़ सेवन न करने का दृढ़ निश्चय किया। बच्चे के माता-पिता बच्चे में यह परिवर्तन देख कर बेहद प्रसन्न हुए एवं महात्मा को बारम्बार धन्यवाद देते हुए बच्चे को लेकर अपने घर चले गए।

महात्मा के शिष्यगण यह घटनाक्रम चुपचाप देख रहे थे। बच्चे एवं उस के माता-पिता के वहाँ से जाते ही उन में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। आखिर उन में से एक बोल ही पड़ा, “गुरु जी! आप स्वयं तो इतना गुड़ खाते हैं। फिर आप ने उस बच्चे को अत्यधिक मात्रा में गुड़ न खाने का उपदेश कैसे दे दिया।” फिर उस शिष्य ने अतीत में घटित एक इसी तरह की घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह एक महात्मा ने पहले स्वयं गुड़ खाना कम किया तब कहीं जा कर एक बालक को ज्यादा गुड़ न खाने का उपदेश दिया।

महात्मा यह सुन कर मुस्कराते हुए बोले, “आप लोगों की यह शंका उचित ही है, परन्तु आप लोग शायद यह नहीं जानते कि मैंने पहले भी इस बुरी आदत को छोड़ने का अत्यधिक प्रयास किया है। परन्तु, मुझे सफलता नहीं मिली। आज बच्चे के दृढ़ निश्चय को देख कर मुझे प्रेरणा मिली है। मैं आज से पुनः इस बुरी आदत को छोड़ने का प्रयास करूँगा। शायद इस बार मैं सफल हो जाऊँ।

लेखक:अनुराग निगम

 

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